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सूरदास जी को कैसे हुई भगवत् ज्ञान की प्राप्ति ?

  सूरदास जी को कैसे हुई भगवत् ज्ञान की प्राप्ति ?

सूरदास जी का बचपन का नाम सूरजचंद था। एक बार सूरजचंद जी का सारा परिवार युद्ध में मारा गया। लेकिन सूरजचंद जी अंधे होने के कारण युद्ध न कर सके और रणभूमि के समीप ही एक कुऍं में जा गिरे। 
सूरजचंद जी भगवान् कृष्ण के बहुत बड़े भक्त थे और भगवान् को विनय के पद बनाकर गाकर सुनाया करते थे। सूरजचंद जी भगवान् को पुकारने लगे और इस तरह सात दिनों तक कुऍं में ही पड़े रहे।

भगवान् से अपने भक्त की यह पीड़ा देखि नहीं गई और भगवान् श्रीकृष्ण ने एक बालक का रूप बनाकर सूरजचंद जी के पास पहुँच गए। भगवान् ने कहा- बाबा ! तुम यहां कहाँ पड़े हो ? मेरा हाथ पकड़ो और ऊपर आ जाओ।
 सूरजचंद जी ने भगवान् का हाथ पकड़ा और स्पर्श करते ही वो समझ गए कि - ये हाथ मेरे प्रभु के ही हैं और वे ही मुझे यहां पर बचाने आये हैं। भगवान् श्रीकृष्ण ने सूरजचंद को बाहर निकाला। सूरजचंद जान गए थे कि ये मेरे भगवान् ही हैं , इसलिए उन्होंने झट से श्रीकृष्ण का हाथ पकड़ लिया। लेकिन श्रीकृष्ण अपना हाथ छुड़ाकर जाने लगे तो इस पर सूरजचंद न कहा -
             "  कर छुटकाए जात हौ निबल जानि कर मोहि।
           " हिरदय सों जब जाहुगे, मरद बदींगो तोहि।।
अर्थात मुझे निर्बल जानकर मेरा हाथ छुड़ाकर जा रहे हो। लेकिन जब मेरे हृदय से जाओगे , तभी मैं आपको बलवान कहूंगा।

भगवान् श्रीकृष्ण ने प्रसन्न होकर सूरजचंद की आँखें खोल दी और उन्हें दर्शन दिए। भगवान् श्रीकृष्ण ने सूरजचंद को वरदान माँगने को कहा , तो सूरजचंद ने तीन वरदान मांगे।
प्रथम वरदान में उन्होंने भगवान् की अनन्य भक्ति मांगी। दूसरे वरदान में कहा कि - हमारे सभी शत्रुओं का नाश हो और तीसरे वरदान में कहा कि- प्रभु ! मैंने जिन आँखों से आपका दर्शन किया है ,उन आँखों से ओर किसी को ना देखने पाऊं।

भगवान् ने कहा कि - ऐसा ही होगा और दक्षिण के ब्राह्मण कुल के द्वारा तुम्हारे शत्रुओं का नाश होगा। तुम विचार , विद्या और बुद्धि से युक्त होगे। श्रीकृष्ण ने सूरजचंद को सूरदास एवं सूरश्याम नाम प्रदान किये और अन्तर्ध्यान हो 
गए। अब सूरजचंद जी का नाम सूरदास हो गया।

सूरदास जी ने जो वरदान माँगा उसका यह भी अर्थ निकलता है कि - सूरदास जी ने अपने भीतर के काम , क्रोध ,लोभ ,मोह आदि शत्रुओं के नाश का वरदान माँगा। जिस पर भगवान् ने कहा कि-  दक्षिण के बाह्मण द्वारा तुम्हारे शत्रुओं का विनाश होगा। ये दक्षिण के बाह्मण ओर कोई नहीं ब्लकि महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य थे , जिन्होंने सूरदास के अंत: करण में भगवत प्रेम का संचार किया।

वैराग्य - भगवान् का दर्शन करके सूरदास जी के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया और उन्होंने सोचा कि अब वो ब्रज में ही वास करेंगे। इस प्रकार सूरदास जी आगरा और मथुरा के बीच स्थित गऊघाट पर आकर रहने लगे। सूरदास जी वहीँ पर पद रचना करते और बड़े सुर में गाते। वहाँ पर कई लोग उनके गाने से आकर्षित होकर उनके सेवक बन गए।

 सूरदास जी को दीक्षा मिलना और भगवत लीला का हृदय में स्फूर्ति होना -
एक समय महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य जी अपने अनुयायियों के साथ गऊघाट पर पधारे। स्नानादि करने के बाद ठाकुर जी के लिए भोजन बनाने लगे। सूरदास जी के एक सेवक ने सूरदास जी के पास जाकर कहा कि - महाराज ! गऊघाट पर श्री वल्लभाचार्य जी अपने अनुयायियों के साथ पधारे हैं।

उन्होंने दक्षिण भारत के समस्त विद्वानों को परास्त किया है और उन्हें श्रीकृष्ण भजन में लगाया है। यह सुनकर सूरदास  जी कहने लगे - तुम जाओ और देखना कि जब महाप्रभु प्रसाद ग्रहण करके अपने आसन पर विराजें ,तो मुझको सूचित कर देना तब ही मैं महाप्रभु के दर्शन करने जाऊँगा।

 महाप्रभु जी ने भोजन बनाने के बाद सबसे पहले ठाकुर जी को भोग लगाया और उसके बाद स्वयं प्रसाद ग्रहण करके आसन पर विराजमान हो गए। उनके सेवक भी उनके पास आकर बैठ गए। सूरदास जी के सेवक ने यह सूचना उनको दे दी। 

सूचना मिलते ही सूरदास जी वहाँ पर पहुँच गए और श्री वल्लभाचार्य जी के पीछे जाकर बैठ गए। श्री वल्लभाचार्य जी कहने लगे - सूरदास ,पीछे क्योँ बैठे हो ? यहां सामने आकर बैठो। सूरदास जी वल्लभाचार्य जी के सामने पास आकर बैठ गए।
महाप्रभु वल्लभाचार्य जी कहने लगे - सूरदास कुछ भगवद यश वर्णन करो। सूरदास जी कहने लगे " जो आज्ञा " और इस प्रकार सूरदास जी ने महाप्रभु को कुछ पद गाकर सुनाए।

महाप्रभु कहने लगे - तुम इतना अच्छा गाते हो , लेकिन ऐसे घिघिया क्योँ रहे हो ? कुछ भगवत् लीला वर्णन करो।
सूरदास जी कहने लगे - महाप्रभु ! मेरे हृदय में भगवत लीला स्फुरित नहीं होती।

महाप्रभु ने कहा - ठीक है , तुम स्नान कर आओ। मैं तुम्हें भगवत लीला समझाऊंगा। सूरदास जी स्नान कर आए। तब महाप्रभु ने पहले तो सूरदास जी को भगवान् का नाम सुनाया। कुछ दिनों के पश्चात श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पण करवाया अर्थात सूरदास जी ने श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण की।

इस प्रकार सूरदास जी की सब अविद्या दूर हो गयी और उन्हें नवधा भक्ति प्राप्त हो गई। महाप्रभु की कृपा से सूरदास जी के हृदय में भगवत लीला स्फुरित हो गई। अब सूरदास जी ने महाप्रभु को भगवत् लीला का पद सुनाया -

" चकईरी चलि चरण सरोवर , जहां न प्रेम वियोग "
अर्थात मैं तो उस चरण सरोवर पर जा रहा हूँ जहां प्रेम का वियोग नहीं है।
महाप्रभु जी समझ गए कि सूरदास जी को लीला स्फूर्ति हो गयी है। इसके बाद सूरदास जी ने बहुत सारे पदों की रचना की। 
महाप्रभु ने सूरदास जी को पुरुषोत्तम सहस्रनाम सुनाया। जिससे सम्पूर्ण श्रीमदभागवतम सूरदास जी के हृदय में स्फुरित हो गई। अब सूरदास जी अपने पदों में भगवान् की लीलाओं का आँखों देखा हाल वर्णन करने लगे।

 कुछ समय पश्चात महाप्रभु जी सूरदास जी के साथ ब्रजधाम   पधारे और सूरदास जी से कहने लगे कि - सूरदास , श्रीगोकुल के दर्शन करो और प्रणाम करो।
सूरदास जी ने गोकुल को दंडवत प्रणाम किया और प्रणाम करते ही सूरदास जी के हृदय में भगवान् श्रीकृष्ण की बाललीला स्फुरित हो गई।

सूरदास जी ने बाललीला के पदों को महाप्रभु को गाकर सुनाया। महाप्रभु ने सोचा कि श्रीनाथ जी के मंदिर में ओर सेवा का तो विधान हो गया है ,लेकिन कीर्तन का विधान नहीं हुआ है। इसलिए यह सेवा तो सूरदास को ही मिलनी चाहिए।
महाप्रभु स्नान करके श्रीनाथ जी के मंदिर में पहुँच गए और सूरदास को भी स्नान करके मंदिर में आने के लिए कहा। सूरदास जी स्नान करके मंदिर में पहुँच गए और श्रीनाथ जी के दर्शन किए। महाप्रभु ने कहा कि- सूरदास, श्रीनाथ जी को कुछ गाकर सुनाओ। 
            
         श्री सूरदास जी ने पद गाया - 
" अबहों नाच्यौ बहुतगोपाल "
महाप्रभु जी बहुत प्रसन्न हुए और कहने लगे सूरदास , अब तो तुम्हारे अन्त: करण में अविद्या रही नहीं ,प्रभु ने सब दूर कर दी। इसलिए भगवान् के यश का वर्णन करो।
सूरदास जी ने पद गाया -
" कोन सुकृत इन ब्रजवासिनकों " 

इस प्रकार सूरदास जी ने बहुत सारे पदों की रचना की और आजीवन कृष्ण भक्ति की। 
         जय श्री राधेकृष्ण

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